आप की विलादत बा सआदत :- इमामुल वासिलीन हुज्जातुल आरफीन मुजद्दिदीन शैखुल इस्लाम यानि सिलसिलए नक्शबंदिया के अज़ीम पेशवा हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसाने शैख़ अहमद सरहिंदी फ़ारूक़ी नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की पैदाइश मुल्के हिन्दुस्तान के मक़ाम “सरहिंद” में 971, हिजरी मुताबिक़ 1563 ईस्वी को हुई |

आप का नामे मुबारक :- आप रहमतुल्लाह अलैह का नाम “अहमद, कुन्नियत, अबुल बरकात और लक़ब “बदरुद्दीन” हैं, आप रहमतुल्लाहि तआला अलैह अमीरुल मोमिनीन हज़रते सय्यदना उमर फ़ारूक़ आज़म की औलाद से हैं |

क़िले की तामीर पांचवें जद्दे अमजद की बरकत (हिकायत) :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह के पांचवे जद्दे अमजद हज़रत सय्यदना इमाम रफीउद्दीन फ़ारूक़ी सोहरवर्दी रहमतुल्लाह अलैह हज़रत सय्यदना मखदूम जहानियाँ जहां गश्त सय्यद जलालुद्दीन बुखारी सोहरवर्दी रहमतुल्लाह अलैह के खलीफा थे, जब ये दोनों हज़रात हिंदुस्तान तशरीफ़ लाए और सरहिदं शरीफ से “मौज़ा सराइस” पहुचें तो वहां के लोगों ने दरख्वस्त की के “मोज़ा सराइस” और “सामाना” का दरमियान रास्ता ख़तरनात है, जंगल में फाड़ खाने वाले खौफनाक जंगली जानवर हैं, आप वक़्त के बादशा सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ को इन दोनों के एक शहर आबाद करने का फरमाएं ताके लोगों को आसानी हो, चुनाचे हज़रते सय्यदना शैख़ इमाम रफीउद्दीन सोहरवर्दी रहमतुल्लाह अलैह के बड़े भाई ख्वाजा फ़तेह उल्लाह रहमतुल्लाह अलैह ने सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के हुक्म पर एक क़िले की तामीर शुरू की, लेकिन अजीब हादिसा पेश आया के एक दिन में जितना क़िला तामीर किया जाता दुसरे दिन वो सब टूट फूट कर गिर जाता, हज़रते सय्यदना मखदूम सय्यदना जलालुद्दीन बुखारी सोहरवर्दी रहमतुल्लाह अलैह को जब इस हादिसे का इल्म हुआ तो आप रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रत इमाम रफीउद्दीन सोहरवर्दी रहमतुल्लाह अलैह को लिखा के आप खुद जाकर क़िले की बुनियाद रखिए और इसी शहर में सुकूनत यानि मुस्तक़िल क़याम फरमाइए, चुनाचे आप रहमतुल्लाह अलैह तशरीफ़ लाए क़िला तामीर फ़रमाया और फिर यहीं सुकूनत इख़्तियार फ़रमाई, हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह की विलादत बा सआदत इसी शहर में हुई |

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आप के वालिद माजिद का मक़ाम :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह के वालिद माजिद हज़रत सय्यदना शैख़ अब्दुल अहद फ़ारूक़ी चिश्ती क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह जय्यद आलिमे दीन और वलिए कामिल थे, आप रहमतुल्लाह अलैह अय्यामे जवानी में इक्तिसाबे फैज़ के लिए हज़रत शैख़ अब्दुल क़ुद्दूस चिश्ती साबरी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में हाज़िर हुए आसतानाए आली पर क़याम का इरादा किया लेकिन हज़रत शैख़ अब्दुल क़ुद्दूस चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया उलूमे दिनिया की तकमील के बाद आना, आप रहमतुल्लाह अलैह जब तहसीले इल्म के बाद हाज़िर हुए तो हज़रत शैख़ अब्दुल क़ुद्दूस चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह (वफ़ात 983, मुताबिक़ 1575 ईस्वी) मसनदे खिलाफत पर जलवा अफ़रोज़ थे, आप रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रत शैख़ अब्दुल अहद फ़ारूक़ी रहमतुल्लाह अलैह को “सिलसिलए क़दीरिया और चिश्तिया में खिलाफत से मुशर्रफ फ़रमाया और फसीह व बलीग़ अरबी में इजाज़त नामा मरहमत फ़रमाया” |
आप रहमतुल्लाह अलैह काफी अरसा सफर में रहे और बहुत से अस्हाबे मारफत से मुलाक़ातें कीं, बिला आखिर सरहिंद तशरीफ़ लाए और आखिर उम्र तक यहीं तशरीफ़ फरमा हो कर इस्लामी क़ुतुब का दरस देते रहे, फ़िक़ह व उसूल में बेनज़ीर थे कुतुबे सूफ़ियाए किराम “”तार्रुफ, अवारिफुल मआरिफ़, और फुसुसुल हिकम”” का दरस भी देते थे, बहुत से मशाइख ने आप रहमतुल्लाह अलैह से इस्तिफ़ादा यानि फ़ायदाह हासिल किया, “सिकंदरे” के क़रीब “इटावै” के एक नेक घराने में आप रहमतुल्लाह अलैह का निकाह हुआ था, इमामे रब्बानी के वालिद मुहतरम शैख़ अब्दुल अहद फ़ारूक़ी रहमतुल्लाह अलैह ने अस्सी 80, साल की उमर में 1007 हिजरी मुताबिक़ 1598, ईस्वी में विसाल फ़रमाया, आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ारे मुबारक सरहिंद शरीफ में है, आप रहमतुल्लाह अलैह ने कई क़ुतुब तसनीफ़ फ़रमाई जिन में “कंज़ुल हक़ाइक़, असरारुत तशहुद” भी शामिल हैं |

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आप की तालीम व तरबियत :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी शैख़ अहमद सर हिंदी फ़ारूक़ी नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह ने अपने वालिद माजिद शैख़ अब्दुल अहद रहमतुल्लाह अलैह से कई उलूम हासिल किए, आप रहमतुल्लाह अलैह को फ़राइज़ के साथ साथ नफाफिल की मुहब्बत भी अपने वालिद माजिद रहमतुल्लाह अलैह से मिली थी चुनाचे फरमाते हैं इस फ़क़ीर को इबादते नाफ़िला ख़ुसूसन नफ़्ल नमाज़ की तौफ़ीक़ अपने वालिद बुज़ुर्गवार से मिली है |
वालिद माजिद के अलावा दूसरे असातिज़ा से भी इस्तिफ़ादा यानि फ़ायदा हासिल किया, मसलन मौलाना कमालुद्दीन कश्मीरी रहमतुल्लाह अलैह से बाज़ मुश्किल किताबें पड़ीं, हज़रत मौलाना शैख़ मुहम्मद याक़ूब सरफी कश्मीरी रहमतुल्लाह अलैह से हदीस की किताबें पढ़ीं और सनद ली, हज़रत क़ाज़ी बहलूल बद खशी रहमतुल्लाह अलैह से क़सीदऐ बुरदाह शरीफ के साथ साथ तफ़्सीर व हदीस की कई किताबें पढ़ीं, हज़रत सय्यदना मुजद्दिद अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह ने 17 साल की उमर में उलूमे ज़ाहिरी से सनादे फरागत पाई |

आप फरमाते हैं जाहिल सूफी शैतान का मसखरा होता है :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिद अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह का अंदाज़े तदरीस निहायत दिल नशीन था आप रहमतुल्लाह अलैह तफ़्सीरे बैज़ावी, बुखारी शरीफ, मिश्कात शरीफ, हिदाया और शरह वगैरह क़ुतुब की तदरीस फरमाते थे, जब आप किसी तालिबे इल्म में कमी या सुस्ती मुलाहिज़ा फरमाते तो अहसन यानि बहुत अच्छे अंदाज़ में इस की इस्लाह फरमाते चुनाचे हज़रत बदरुद्दीन सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं में जवानी के आलम में अक्सर गलबए हाल की वजह से पढ़ने का ज़ौक़ न पाता तो आप रहमतुल्लाह अलैह कमाले महरबानी से फरमाते सबक़ लाओ और पढ़ो क्यों के “जाहिल सूफी तो शैतान का मसखरा है |

आप का मज़ार शरीफ हिंदुस्तान के सूबा पंजाब के ज़िला फ़तेह गढ़ में आप का मज़ारे पुर अनवार है,

बाद शाह अकबर की गुमराहीयत व घमंड आप ने मिटटी में मिला दिया :- आइए उस सूफी यान अल्लाह के वाली की बात करते हैं जो इमामुल औलिया है वलीए कामिल है और अपने वक़्त का “मुजद्दिद” भी है, दीन का मुहाफ़िज़ भी है असारारे खुदा वन्दी का अमीन भी रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नतों का आमिल आलमे रब्बानी है, यानि हुज़ूर मुजद्दिदे अल्फिसानी हैं, मुग़ल शहंशाह अकबर के अहदे हुकूमत में इस्लाम के सर सब्ज़ो शादाब चमन पर एक बार फिर कुफ्र व इलहाद ज़िन्दिका (यानि बे दीनी दीन से फिर जाना गुमराह) और बिदअत व गुमराही की घटा टोप आंधियां छा गईं, उस ने दीने हनीफ को बदल के एक नए दीन की बुनियाद रखी “दीने इलाही” के नाम से एक ऐसा मज़हब बनाया जो शरीअते इस्लामिया मज़हबे इस्लाम के बिल कुल सरासर मुखालिफ और क़ुरआनो सुन्नत से इंकार व इंहिराफ़ (फिर जाना) था | दीने इस्लाम की सच्चाई व अज़मत का चिराग जो एक हज़ार साल से रौशन था, वो वक़्त के बादशाह सूफियों के हाथ टिमटिमाने लगा, बादशाह अकबर को रियाया के तमाम तबकों के लिए क़ाबिले क़बूल बनाने के लिए अक़ीदए तौहीद में इस क़द्र बदला गया के हिन्दुओं की बुतपरस्ती मजूसीयों की आतिश परस्ती, और वेदों की फ़लसफ़ियाना मोशगाफ़ियों को नए दीन में समेट लिया गया इस तरह बादशाह अकबर “दीने इलाही” अलग अलग मज़हबों के अक़ाइद व ख्यालात का एक मग़्लूबा बन गया था, किताबुल्लाह और सुन्नते रसूलुल्लाह जो दीन की असल बुनियाद थी, वो ख़त्म कर दी गईं ,सूरज की पूजा चरों तरफ लाज़मी क़रार दी गई आग, पानी, दरख्त और गए को पूजना जाइज़ ठहराया |
अकबर हर रोज़ सुबह उठा कर सूरज की पूजा करता, उस के बाद मुश्ताकाने दीद के लिए दीवाने आम में बैठता था लोग शहंशाह के लिए सज्दए ताज़ीमी करते, हिन्दू औरतों से शादियां कर लेने के बाद अकबर के दिल में हिन्दुओं के लिए नरम गोशा पैदा हो गया था, हुकूमत के बड़े बड़े उहदों पर हिन्दू फ़ाइज़ थे, वो मुसलमानो की हर आन हर लम्हा दिल आज़ारी करते, मस्जिदे शहीद करके वहां मंदिर बनाए गए, हिन्दुओं के बरत का दिन आता तो मुसलमानो को दिन में खाने पीने से रोक दिया जाता उन्हें हुक्म होता के वो अपने चूहले न जलाएं लेकिन जब रमज़ानुल मुबारक का महीना आता तो हिन्दू सरे आम खाते रमज़ान की इज़्ज़त व हुरमत की हिफाज़त के लिए बादशाह कोई फरमान जारी न करता था, हालात बहुत ही ज़्यादा खराब थे दीन के पनपने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती थी मगर हमेशा ये हुआ के जब भी दीने इस्लाम पर कोई आज़माइश का वक़्त आया रहमते हक़ में इर्तिआश जोश पैदा हुआ दीने हक़ की हिफाज़त के लिए कोई न कोई हस्ती इन तीरह व तरीक फ़ज़ाओं में ऐसे अंधेरों में नमूदार हुई जिसकी नूरानी किरनो से कुफ्र इलहाद गुमराहीयत की तारीकियां अँधेरा छट गया |
जसिकी ज़िया बार रौशनी ताबनियों से बिदअत व गुमराही की आंधियां ख़त्म हो गईं, जिस की शुआओं चमक से सारा आलम भी मुनव्वर व रौशन हो गया और तौहीद व सुन्नत की मशआलें चमक उठीं, जब कुफ्र शिर्क बिदअत गुमराही व इलहाद की आंधियां अपनी तमाम तारीकियों समीत हिंदुस्तान की फ़िज़ा पर छा गईं तो आसमान “सर हिंद” पर सुन्नत व हिदायत का सूरज निकला जिसको लोग “शैख़ अहमद मुजद्दिदे अल्फिसानि सरहिंदी” के नाम से मौसूम करते हैं, इस आफताब सूरज की रौशिनी से यानि शैख़ अहमद मुजद्दिदे अल्फिसानि सरहिंदी से ज़ुल्मत व गुमराही के अँधेरे काफूर हुए, अकबर के जिस दीन की बुनियाद रखी थी जिसकी तब्लीग में हर वक़्त में लगा रहता था हज़रत शैख़ अहमद मुजद्दिदे अल्फिसानि सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह ने उसको जड़ से ख़त्म किया |
हम देखते हैं के हक़ अपने तमाम जलवा सामानियों से निकलता है तो बातिल ख़त्म हो जाता है, बादशाह को रियाया सजदह करती थी, जब हज़रत शैख़ अहमद मुजद्दिदे अल्फिसानि सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह जहगीर के दरबार में पहुंचे तो उसने भी यही सोचा था लेकिन आपने सजदा करने से इंकार कर दिया था, आप ने फ़रमाया अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की ज़ात के अलावा सजदा किसी के लिए जाइज़ नहीं, फ़रमाया ये गर्दन कट तो सकती है लेकिन बातिल के आगे झुक नहीं सकती, जबी तो अल्लामा डॉक्टर इक़बाल ने क्या खूब लिखा है |

गर्दन न झुकी जिसकी जहांगीर के आगे
जिसके नफ़्से गरम से है गर्मीए एहरार


हाज़िर हुआ में शैख़ मुजद्दिद की लहिद पर
वो ख़ाक के है ज़ेरे फलक मतलए अनवार


वो हिन्द में सरमायाए मिल्लत का निगेहबान
अल्लाह ने बर वक़्त किया जिसको खबर दार


इस ख़ाक के ज़र्रों से हैं शर्मिंदाह सितारे
इस ख़ाक में पोशीदह है वो साहिबे असरार

बादशाह को दरबारियों के क़त्ल करने के लिए उभारा, जो बादशाह को सजदा न करे वो क़त्ल का मुस्तहिक़ है, लेकिन बादशाह को क़त्ल की जुरअत न हुई, आप को “क़िला गोवालिअर” में नज़र बंद कर दिया गया आप ने इन हालात में भी तब्लीग का सिलसिला जारी रखा बिला आखिर आप की कोशिश रंग लाइ जो इस्लाम पर पाबंदियां थीं वो खत्म कर दी गईं इस्लाम का बोल बाला हो गया हर तरफ इस्लाम की बहारे नज़र आने लगीं, ये थे अच्छे सूफी अल्लाह वाले अल्लाह के वली,

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मुजद्दिदे अल्फिसानी का हुलिया मुबारिका :- आप रहमतुल्लाह अलैह की रंगत गंदुमी माइल बा सफेदी थी, पेशानी कोशादा और चेहराए मुबारक खूब ही नूरानी था अबरू दराज़, सियाह और बारीक थे आँखें कोशादा और बड़ी जबके बीनी यानि नाक बारीक और बुलंद थी, लब यानि होंठ सुर्ख और बारीक दांत मोती की तरह एक दूसरे से मिले हुए और चमकदार थे रेश यानि दाढ़ी मुबारक घनी दराज़ थी, आप रहमतुल्लाह अलैह दराज़ क़द और नाज़ुक जिस्म थे, आप के जिस्म पर मख्खी नहीं बैठती थी, पाऊँ की एड़ियां साफ़ और चमकदार थीं आप रहमतुल्लाह अलैह ऐसे नफीस यानि साफ़ सुथरे थे के पसीने से नागवार बू नहीं आ थी |

सुन्नते निकाह यानि आप की शादी :- हज़रत मुजद्दिदे अल्फिसानि रहमतुल्लाह अलैह के वालिद माजिद हज़रत शैख़ अब्दुल अहद फ़ारूक़ी रहमतुल्लाह अलैह जब आप को आगरा (हिंदुस्तान) से अपने साथ सरहिंद ले जा रहे थे रास्ते में जब थानीसर पहुंचे तो वहां के रईस शैख़ सुल्तान की साहबज़ादी से हज़रत मुजद्दिद अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह का अक़्दे मसनून यानि सुन्नते निकाह करवा दिया |
मुजद्दिदे अल्फिसानी हनफ़ी हैं :- हज़रत सय्यदना इमामे रब्बानी मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह सिराजुल अइम्मा हज़रते सय्य्दना इमामे आज़म अबू हनीफा नोमान बिन साबित रहमतुल्लाह अलैह के मुक़ल्लिद होने के सबब हनफ़ी थे, आप रहमतुल्लाह अलैह सय्यदना इमामे आज़म अबू हनीफा रहमतुल्लाह अलैह से बे इंतहा अक़ीदत व मुहब्बत रखते थे |

इज़ाज़तो खिलाफत यानि आप के पीरो मुर्शिद कौन हैं? :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह को मुख्तलिफ सलासिले तरीक़त में इज़ाज़तो खिलाफत हासिल थी (1) सिलसिलए सोहरवर्दिया कुबराविया में अपने उस्तादे मुहतरम हज़रत शैख़ याक़ूब कश्मीरी रहमतुल्लाह अलैह से इज़ाज़तो खिलाफत हासिल फ़रमाई (2) सिलसिलए चिश्तिया और क़ादिरिया में अपने वालिद माजिद हज़रत शैख़ अब्दुल अहद चिश्ती क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह से इज़ाज़तो खिलाफत हासिल थी (3) सिलसिलए क़ादिरिया में खेतली (मुज़ाफ़ाते सरहिंद) के बुज़रुग हज़रत शाह सिकंदर क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह से इज़ाज़तो खिलाफत हासिल थी (4) सिलसिलए नक्शबंदिया में “”हज़रत ख्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह से इज़ाज़तो खिलाफत हासिल फ़रमाई”” हज़रत मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह ने तीनो सिलसिलों में इक्तिसाबे फैज़ का यूं ज़िक्र फ़रमाया है मुझे कसीर वास्तों के ज़रिये नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इरादत हासिल है सिलसिलए नक्शबंदिया में 21, इक्कीस सिलसिलए क़ादिरिया में पच्चीस 25, और सिलसिले चिश्तिया में 27, वास्तों से हासिल थी |

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पीरो मुर्शिद का अदब व एहतिराम (हिकायत) :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह अपने पीरो मुर्शिद हज़रत ख्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह का बेहद अदब व एहतिराम फ़रमाया करते थे और हज़रत ख्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह भी आप को बड़ी क़द्रो मन्ज़िलत की निगाह से देखते थे, चुनाचे एक दिन हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह हुजरे शरीफ में तख़्त पर आराम फरमा रहे थे,
के हज़रत ख्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह दूसरे दुरवेशों की तरह तने तनहा तशरीफ़ लाए, जब आप हुजरे के दरवाज़े पर पहुंचे तो खादिम ने हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह को बेदार करना चाहा मगर आप रहमतुल्लाह अलैह ने सख्ती से मना फ़रमा दिया और कमरे के बाहर ही आप के जागने का इन्तिज़ार करने लगे, थोड़ी ही देर बाद हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह की आँख खुली बाहर आहट सुन कर आवाज़ दी कौन है? हज़रत ख्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया फ़क़ीर मुहम्मद बाक़ी आप रहमतुल्लाह अलैह आवाज़ सुनते ही तख़्त से बेक़ारारी के आलम में उठा खड़े हुए और बाहर आकर निहायत इंकिसारी के साथ पीर साहब के सामने बा अदब बैठ गए |

आप का मज़ार शरीफ हिंदुस्तान के सूबा पंजाब के ज़िला फ़तेह गढ़ में आप का मज़ारे पुर अनवार है,

आप की हज़रत ख्वाजा बाक़ी बिल्लाह के मज़ार पर हाज़री :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह मरकज़ुल औलिया लाहौर में थे के 25, जमादिउल आखिर 1012, हिजरी में आप रहमतुल्लाह अलैह के “पीरो मुर्शिद हज़रत सय्यदना ख्वाजा मुहम्मद बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह” का देहली में विसाल हो गया, ये खबर पहुंचते ही आप फ़ौरन दिल्ली रवाना हो गए, दिल्ली पहुंच कर मज़ारे पुर अनवार की ज़ियारत की फातिहा ख्वानी और अहले खाना की ताज़ियत से फारिग हो कर सरहिंद शरीफ तशरीफ़ लाए |
इमाम ग़ज़ाली के गुस्ताख़ को डांटना :- एक मर्तबा हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह के सामने फ़लासिफ़ा की तारीफ करने लगा, उसका अंदाज़ा ऐसा था के जिससे उल्माए किराम की तौहीन लाज़िम आती थी, आप रहमतुल्लाह अलैह ने उसे समझाते हुए फ़लासिफ़ा के रद में हज़रत सय्यदना इमाम मुहम्मद बिन मुहम्मद ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह का फरमाने आली सुनाया तो वो शख्स मुँह बिगाड़ कर कहने लगा ग़ज़ाली ने नामाक़ूल बात कही है माज़ अल्लाह, हज़रत सय्यदना इमाम मुहम्मद बिन मुहम्मद ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह की शान में गुस्ताखाना जुमला सुन कर आप रहमतुल्लाह अलैह को जलाल आगया फ़ौरन वहां से उठे और उसे डांटते हुए इरशाद फ़रमाया अगर अहले इल्म की सुहबत का ज़ौक़ रखते हुए तो ऐसी बे अदबी की बातों से अपनी ज़बान बंद रखो |

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आप की शौक़े तिलावत :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह सफर में तिलावते क़ुरआने फरमाते रहते बसा औक़ात तीन तीन चार चार पारे भी मुकम्मल फ़रमा लिया करते थे इस दौरान आयते सजदा आती तो सवारी से उतर कर सज्दए तिलावत फरमाते,
हज़रत हाजी हबीब अहमद रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं जिस दिन मेने हज़रत सय्यदना मुजद्दिद अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह को कलमए तय्यबा का सवाब नज़र किया इसी दिन से आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने लिए एक हज़ार दाने वाली तस्बीह बनवाई और तन्हाई में इस पर कलमए तय्यबा का विरद फरमाने लगे, शबे जुमा को ख़ास तौर पर मुरीदीन के साथ उसी तस्बीह पर एक हज़ार दुरूद शरीफ का विरद फ़रमाया करते |

फातिहा इसाले सवाब का सुबूत (हिकायत) :- इमामे रब्बानी मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं पहले अगर में कभी खाना पकाता तो इस का सवाब हुज़ूर सरवरे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व अमीरुल मोमिनीन हज़रत मौलाए काइनात आली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहाहुल करीम हज़रते खातून जन्नत फातिमा ज़ेहरा हज़रते हसनैन करीमैन रदियल्लाहु तआला अन्हुम की अरवाहे मुक़द्दसा के लिए ही ख़ास इसाले सवाब करता था, के जनाबे रिसालते मआब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ़ फरमा थे,
मेने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत बा बरकत में सलाम अर्ज़ किया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरी जानिब मुतावज्जेह न हुए और चेहराए अनवर दूसरी जानिब फेर लिया और मुझ से फ़रमाया में आएशा के घर खाना खता हूँ, जिस किसी ने मुझे खाना भेजना हो वो हज़रत आयशा के घर भेजा करे इस वक़्त मुझे मालूम हुआ के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तवज्जु न फरमाने का सबब था के में उम्मुल मोमिनीन हज़रते आएशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहु तआला अन्हा को शरीके तआम यानि इसाले सवाब न करत था उस के बाद से में हज़रत सय्यदह आएशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहु अन्हा बल्के तमाम उम्महातुल मोमिनीन रदियल्लाहु तआला अनहुन्ना को बल्के सब अहले बैत को शरीक किया करता हूँ और तमाम अहले बैत को अपने लिए वसीला बनता हूँ |
नोट :- इस से ये साबित हुआ के ये आप का अक़ीदा है के न्याज़ व फातिहा पढ़ना पढ़ाना बिलकुल जाइज़ व दुरुस्त है और वसीला लेना भी जाइज़ है अगर नाजाइज़ होता तो आप हरगिज़ ऐसा नहीं करते क्यूंकि आप अपने वक़्त के “मुजद्दिद वालिए कामिल शैख़े तरीक़त” थे |

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एक वक़्त में दस घरों में तशरीफ़ आवरी :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी शैख़ अहमद सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह को दस मुरीदों में से हर एक ने माहे रमज़ान में एक ही दिन अफ्तार की दावत दी, आप रहमतुल्लाह अलैह ने सब की दावत क़बूल फ़रमाली, जब ग़ुरूब आफताब का वक़्त हुआ तो एक ही वक़्त में सब के पास तशरीफ़ ले गए और उनके साथ रोज़ा इफ्तार फ़रमाया |
फ़ौरन बारिश बंद हो गई :- एक बार बारिश हो रही थी तो हज़रत सय्यदना मुजद्दिद अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह ने आसमान की तरफ नज़र उठाई और बारिश से इरशाद “फुलां वक़्त तक रुक जा” बारिश उसी वक़्त रुक गई |

इसे हाथी के पाऊँ ताले कुचलवा दिया जाए (हिकायत) :- एक अमीर ज़ादे से बादशाह नाराज़ हो गया और उसे मर्कज़ुल औलिया लाहौर से सरहिंद तलब किया, इस के बारे में ये हुक्म जारी किया के जैसे ही ये आये तो इसे हाथी के पाऊँ के नीचे कुचलवा दिया जाए, वो अमीर ज़ादा जब सरहिंद पंहुचा तो हज़रते सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमते बा बरकत में हाज़िर होकर निहायत ही आजिज़ी के साथ अपनी निजात के लिए अर्ज़ग़ुज़ार हुआ, आप रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने कुछ देर मुराकिबा किया फिर फ़रमाया बादशाह की तरफ से तुम्हे कोई तकलीफ नहीं पहुंचेगी,
बल्के वो तुम पे महिरबान होगा इस अमीर ज़ादे ने अर्ज़ की आली जाह आप लिखकर दे दीजिये ताके ये तहरीर मेरी तसकीने क़ल्बी यानी दिल के सुकून का सामान हो चुनाचे आप रहमतुल्लाह अलैह ने उस की तसल्ली के लिए ये तहरीर फ़रमाया “ये शख्स बादशाह के गुस्से के खौफ से यहाँ आया है लिहाज़ा इस फ़क़ीर ने अपनी ज़मानत में लेकर उसे इस मुसीबत से रिहाई दे दी” वो अमीर ज़ादा जैसे ही बादशाह के दरबार में पंहुचा तो आप रहमतुल्लाहि तआला अलैह के इरशाद के मुताबिक़ बादशाह ने उसे देखा तो मुस्कुराया और नसीहत के तौर पर चाँद बातें कहीं और निहायत महरबानी के साथ इनाम वा इकराम से नवाज़ कर रुखसत कर दिया |

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दिल की बात जान ली (हिकायत) :– हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाहि तआला अलैह के एक मुरीद का बयान है के में छुप कर अफ्यून खाया करता था और इस बारे में किसी को भी मालूम नहीं था एक दिन में आप के साथ जा रहा था तो आप रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने मेरी तरफ देख कर फ़रमाया क्या बात है तुम्हारे दिल में तारीकी यानि अँधेरा देखता हूँ? मेने इक़रार क्या में छुप कर अफ्यून खाता हूँ लेकिन अब इससे तौबा करता हूँ |

आप का मज़ार शरीफ हिंदुस्तान के सूबा पंजाब के ज़िला फ़तेह गढ़ में आप का मज़ारे पुर अनवार है,

बच्चे के बारे में गैबी खबर (हिकायत) :- हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाहि तआला अलैह के एक अज़ीज़ के यहाँ बेटा पैदा तो होता लेकिन छोटी उमर में ही फौत यानि ख़त्म हो जाता, एक बार जब बेटा पैदा हुआ तो वो अपने बच्चे को लेकर आप की खदिमाते बा बरकत में हाज़िर हुआ और सारा माजिरा सुनाया और अर्ज़ की के हमने मन्नत मानी है के अगर बच्चा बड़ा हुआ तो हम उसे आप की गुलामी में दे देगें, आप रहमतुल्लाह अलैह इरशाद फ़रमाया उसका नाम अब्दुल हक़ रखो ये ज़िंदाह रहेगा और बड़ी उमर पाएगा लेकिन हर माह “हज़रत ख्वाजा नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की नियाज़ दिलवाते रहो” अल्हम्दुलिल्लाह आप के फरमान की बरकत से वो बच्चा बड़ी उमर को पंहुचा |

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सहाबिए रसूल हज़रत अमीर मुआविया से बद अकीदगी रखने वाले का ख्वाब में इलाज :- एक शख्स बाज़ सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान खास तौर से हज़रते सय्यदना अमीर मुआविया रदियल्लाहु अन्हु से माज़ अल्लाह कीना यानि दुश्मनी रखता था, एक दिल वो “मक्तूबाते इमामे रब्बानी” का मुतालआ कर रहा था के उस में ये इबारत पढ़ी “हज़रत सय्यदना इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रत सय्यदना अमीर मुआविया रदियल्लाहु अन्हु को बुरा कहने को हज़रते सय्य्दना सिद्दीक़े अकबर, हज़रते सय्यदना फ़ारूक़ी आज़म रदियल्लाहु अन्हुमा को बुरा कहने के बराबर क़रार दिया है तो वो आप से रंजीदह हो गया माज़ अल्लाह मक्तूबात शरीफ की किताब ज़मीन पर फेंक दी, जब वो शख्स सोया तो हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह उस के ख्वाब में तशरीफ़ लाए आप निहायत जलाल में उसके दोनों कान पकड़कर फरमाने लगे,
तो हमारी तहरीर पर एतिराज़ करता है और उसे ज़मीन पर फेंकता है अगर तो मेरे क़ौल यानि बात को मोतबर नहीं समझता तो आ हज़रते सय्यदना अली कर्रामल्लाहु तआला वज हहुल करीम ही के पास ले चलूँ जिनकी खातिर तू सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान को बुरा कहता है फिर आप उसे ऐसी जगह लगाए जहां एक नूरानी चेहरे वाले बुजरुग तशरीफ़ फरमा थे हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह निहायत आजिज़ी से उस बुजरुग को सलाम किया फिर उस शख्स को नज़दीक बुलाकर फ़रमाया ये तशरीफ़ फरमा बुजरुग हज़रते सय्यदना अली कर्रामल्लाहु तआला वज हहुल करीम हैं सुन ये किया फरमाते हैं, उस शख्स ने सलाम किया हज़रते सय्यदना अली कर्रामल्लाहु तआला वज हहुल करीम ने उसे सलाम का जवाब देने के बाद फ़रमाया खबरदार रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा से कदूरत यानि रंजिश न रखो, उनके बारे मे कोई गुस्ताखाना जुमला ज़बान पर न लाओ फिर हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह की जानिब इशारा करके उससे फ़रमाया उनकी तहरीर से हरगिज़ न फिरना यानि मुखालिफत इस नसीहत के बाद भी उस के दिल से सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान का कीना दूर न हुआ तो हज़रते सय्यदना अली कर्रामल्लाहु तआला वज हहुल करीम ने फ़रमाया इस का दिल अभी तक साफ़ न हुआ, ये फरमा कर हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह से थप्पड़ मारने का हुक्म दिया हुक्म की तकमील करते हुए जूंही आपने गुद्दी पर थप्पड़ मारा तो दिल से सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान की सारी कदूरत यानि नफरत दुहल गई जब वो बेदार हुआ तो उस का दिल सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान की मुहब्बत से मामूर था और आप रहमतुल्लाह अलैह की मुहब्बत भी सौ गुना ज़्यादा बढ़ चुकी थी |

आप की तसानीफ़ :- आप रहमतुल्लाह अलैह की तसानीफ़ में से फ़ारसी “मक्तूबाते इमामे रब्बानी” ज़्यादा मशहूर हुई, अरबी, उर्दू, तुर्की, अंग्रेजी ज़बानों में तराजिम भी शाए हो चुके हैं, आप रहमतुल्लाह अलैह के चार 4, रसाइल के नाम मुलाहिज़ा हों (1) इत्तिबातुन नुबूवत (2) रिसाला तेहलीलिया (3) मारिफे लदुनिया (4) शरह रुबाईयात |

हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह के 11,अक़वाल :- हलालो हराम के मुआमले में हमेशा बा अमल उलमा से रुजू करना चाहिए और उनके फतावा के मुताबिक़ अमल करना चाहिए क्यूंकि निजात का ज़रिया शरीअत ही है |
अहकामे शरीअत की सही नौईयत उल्माए आख़िरत से मालूम कीजिये उन के कलाम में एक तासीर है शयद उन के मुबारक कलमात की बरकत से अमल की भी तौफ़ीक़ मिल जाए |
तमाम कामो में इन बा अमल उल्माए किराम के फतावा के मुताबिक़ ज़िन्दगी बसर करनी चाहिए जिन्होंने अज़ीमत का रास्ता इख्तियार कर रखा है और “रुखसत” से इज्तिनाब करते यानि बचते हैं नीज़ इस को निजाते अब्दी व उखरवी का ज़रिया क़रार देना चाहिए |
निजाते आख़िरत तमाम अफआल व अक़वाल, उसूल व फुरू में अहले सुन्नत की पैरवी करने पर मौक़ूफ़ है |
सरकारे दोआलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का साया नहीं था |
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने ख़ास इल्मे ग़ैब पर अपने ख़ास रसूलों को बा खबर फरमाता है |
हुज़ूर सरकारे दोआलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तमाम सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान को भलाई के साथ याद करना चाहिए |
सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान में सब से अफ़ज़ल हज़रत सय्यदना अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहु अन्हु फिर उनके बाद सब से अफ़ज़ल सय्यदना फ़ारूक़ आज़म रदियल्लाहु अन्हु हैं इन दोनों बातों पर सहाबए किराम अलैहिमुर्रिज़वान और ताबईने किराम का इज्मा है, इमामे आज़म अबू हनीफा व इमामे शाफ़ई व इमामे मालिक व इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाह अलैहम अजमईन और अक्सर उल्माए अहले सुन्नत के नज़दीक हज़रत सय्यदना उमर फ़ारूक़ आज़म के बाद तमाम सहाबए किराम में सब से अफ़ज़ल सय्यदना उस्माने गनी हैं, फिर इन के बाद सब से अफ़ज़ल सय्यदना मौला अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु हैं,
मजलिसे मिलाद शरीफ में अगर अच्छी आवाज़ के साथ क़ुरआने करीम की तिलावत की जाए, नात शरीफ पढ़ी जाए और सहाबा व अहले बैत व औलिआए कमिलीन रदियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन की मन्क़बत पढ़ी जाए तो इस में क्या हर्ज है,
हुज़र ताजदारे रिसालत रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कमाले मुहब्बत की अलामत ये है की आदमी हुज़ूर रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दुश्मनो से दुश्मनी रखे |

आप का मज़ार शरीफ हिंदुस्तान के सूबा पंजाब के ज़िला फ़तेह गढ़ में आप का मज़ारे पुर अनवार है,

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मुजद्दिदे अल्फिसानी और आला हज़रत :- आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत मुजद्दिदे दीनो मिल्लत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह की मुबारक ज़िन्दगी के कई गोशे ऐसे हैं जिन में हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह की सीरत की झलक नज़र आती है बल्के तालीम व तरबीयत दीनी खिदमात हत्ता के विसाल के महीने में भी यकसानियत है इस की तफ्सील कुछ यूं है, हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह और इमामे अहले सुन्नत मुजद्दिदे दीनो मिल्लत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह दोनों का नाम अहमद है, दोनों बुज़ुर्गों ने अपने अपने वालिद से इल्मे दीन हासिल किया, दोनों हज़रात की तमाम उमर इस्लाम के खिलाफ उठने वाले फ़ितनो की सरकूबी में बसर हुई, दोनों बुज़ुर्गों ने कभी भी बातिल के सामने सर नहीं झुकाया, दोनों औलियाए किराम का विसाल सफारुल मुसाफ़र के महीने में हुआ |

आप की औलाद के मुबारक नाम :- आप रहमतुल्लाह अलैह के 7, सात शहज़ादे और तीन शहजादियां थीं जिनकी तफ्सील ये है: बेटे (1) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद सादिक़ रहमतुल्लाह अलैह (2) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद सईद रहमतुल्लाह अलैह (3) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद मासूम रहमतुल्लाह अलैह (4) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद फर्रुख रहमतुल्लाह अलैह (5) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद ईसा रहमतुल्लाह अलैह (6) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद अशरफ रहमतुल्लाह अलैह (7) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद याहया रहमतुल्लाह अलैह, बेटियां बीबी (1) रुक़य्या बानो रहमतुल्लाह तआला अलैहा (2) बीबी खदीजा बनो रहमतुल्लाह तआला अलैहा (3) बीबी उम्मे कुलसूम रहमतुल्लाह तआला अलैहा |

आप के खुलफाए किराम :- साहबज़ादा ख्वाजा मुहम्मद सादिक़, साहबज़ादा ख्वाजा मुहम्मद सईद, सहबजजादा ख्वाजा मुहम्मद मासूम, हज़रत मेरे मुहम्मद नोमान बुरहान पुरी, शैख़ मुहम्मद ताहिर लाहोरी, शैख़ करीमुद्दीन बाबा हसन अब्दाली, ख्वाजा सय्यद आदम बन्नोरी, शैख़ नूर मुहम्मद पटनी, शैख़ बदीउद्दीन, शैख़ ताहिर बदखशी, शैख़ यार मुहम्मद क़दीम तालकानी, हज़रत अब्दुल हादी बदायूनी, ख्वाजा मुहम्मद हाशिम, शैख़ बदरुद्दीन सर हिंदी रहीमा हुमुल्लाहु तआला |

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मुजद्दिदे अल्फिसानी सरहिंदी और खुलफाए आला हज़रत :- आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह के एक खलीफा इमामुल मुहद्दिसीन हज़रत सय्यदना मुहम्मद दीदार अली शाह अलवरी रहमतुल्लाह अलैह भी नक्शबंदी मुजद्दिदी हैं, सरकार आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह के खुलफ़ा को भी हज़रत सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह से बे पनाह अक़ीदत व मुहब्बत थी, सय्यदी क़ुत्बे मदीना हज़रत अल्लामा ज़ियाउद्दीन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह ने एक बार सर पर दोनों हाथ रखकर इरशाद फ़रमाया हज़रते मुजद्दिदे अल्फिसानी तो हमारे सरके ताज हैं |
ख़लीफ़ए आला हज़रत सय्यदना अबुल बरकात सय्यद अहमद क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रते सय्यदना मुजद्दिदे अल्फिसानी के “चालीस 40 इरशादात जमा फरमाए” |

आप का विसाले पुरमलाल :- 28 सफारुल मुज़्ज़फ़्फ़र 1034, हिजरी मुताबिक़ 1624 ईस्वी को जाने अज़ीज़ अपने ख़ालिक़े हक़ीक़ी के सुपुर्द करदी | अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की आप पर रहमत हो या रब्बे मुस्तफा हमें अपने वलिए बर हक़ हज़रत सय्यदना इमामे रब्बानी मुजद्दिदे अल्फिसानी रहमतुल्लाह अलैह के सदक़े बे हिसाब मगफिरत से मुशर्रफ फरमा कर जन्नतुल फिरदोस में अपने प्यारे हबीब रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पड़ोस नसीब फरमा अमीन | आप का मज़ार शरीफ हिंदुस्तान के सूबा पंजाब के ज़िला फ़तेह गढ़ में आप का मज़ारे पुर अनवार है,

मआख़िज़ व मराजे :- तज़किराए मुजद्दिदे अल्फिसानी, ज़ुबदतुल मक़ामात, मक्तूबाते इमामे रब्बानी दफ्तर सोम, सीरते मुजद्दिदे अल्फिसानी, हज़रातुल क़ुद्स, तारीखे हिन्दो पाक, तारीखे मशाइखे नक्शबंदिया,

JazakAllah

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